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ईरान डील पर ट्रंप से क्यों नाराज हैं खाड़ी देश? बढ़ती बेचैनी के पीछे बड़ी वजह

ईरान के साथ समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति पर अब खाड़ी देशों की बेचैनी खुलकर सामने आने लगी है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत और अन्य अमेरिकी सहयोगी इस बात से चिंतित हैं कि वॉशिंगटन की नीति में लगातार बदलाव से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ रही है।

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ईरान डील पर ट्रंप से क्यों नाराज हैं खाड़ी देश? बढ़ती बेचैनी के पीछे बड़ी वजह

ईरान डील पर ट्रंप से क्यों नाराज हैं खाड़ी देश? बढ़ती बेचैनी के पीछे बड़ी वजह

वॉशिंगटन/दुबई। ईरान संकट को खत्म करने और क्षेत्र में शांति बहाल करने की अमेरिकी कोशिशों को लेकर अब एक नया तनाव सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति से अमेरिका के प्रमुख खाड़ी सहयोगियों में नाराजगी और अविश्वास बढ़ने की खबर है। ताजा रिपोर्टों में अरब और पश्चिमी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि खाड़ी देशों को अब इस बात की चिंता सताने लगी है कि ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ स्थायी समझौते तक पहुंचने में सक्षम होगा या नहीं।

मामला सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध खाड़ी देशों की सुरक्षा, तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से है।

बातचीत हुई, लेकिन नतीजा अब भी दूर

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अभी तक कोई निर्णायक सफलता नहीं मिली है।

रॉयटर्स की 12 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक जून में बने अंतरिम शांति समझौते को फिर से लागू करने के प्रयास ठहर गए हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते की शर्तों का पालन न करने का आरोप लगा रहे हैं। ईरान का कहना है कि अमेरिका ने अपने हिस्से की कुछ प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं कीं, जबकि अमेरिका ईरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में विफल रहने का आरोप लगा रहा है।

यही गतिरोध अब खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया है।

खाड़ी देश ट्रंप से क्यों नाराज हैं?

खाड़ी देशों की चिंता का सबसे बड़ा कारण अमेरिकी नीति में दिखाई दे रहा उतार-चढ़ाव है। हाल के हफ्तों में ट्रंप ने कभी ईरान पर कड़े सैन्य हमले की चेतावनी दी, तो कभी बातचीत और समझौते की संभावना पर जोर दिया।

15 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी देशों के अधिकारी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि ट्रंप की बदलती रणनीति ईरान के साथ संकट को खत्म करने के बजाय उसे और लंबा कर सकती है।

खाड़ी देशों के लिए समस्या यह है कि वे एक तरफ अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था और सैन्य सहयोग पर निर्भर हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ सीधा टकराव उनके अपने शहरों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री व्यापार को खतरे में डाल सकता है।

कभी हमले की धमकी, फिर बातचीत की पहल

अमेरिका-ईरान संकट में हाल के दिनों में घटनाक्रम बेहद तेजी से बदला है। ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य हमले की चेतावनी दी थी, लेकिन बाद में खाड़ी देशों के नेताओं के साथ बातचीत के बाद हमले को टालने और बातचीत का रास्ता अपनाने की बात कही।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया था कि खाड़ी सहयोगियों की राय ने हमले को रोकने के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देशों की भूमिका सामने आई।

लेकिन इसके बाद भी ईरान के साथ बातचीत को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई। एक समय ट्रंप ने कहा कि बातचीत चल रही है, जबकि ईरान की ओर से ऐसी बातचीत के दावे को खारिज किया गया। इस विरोधाभास ने कूटनीतिक समाधान को लेकर अनिश्चितता और बढ़ा दी।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा मुद्दा

ईरान संकट का सबसे संवेदनशील हिस्सा Strait of Hormuz है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां किसी भी लंबे समय तक व्यवधान का असर केवल ईरान और खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकते हैं।

ताजा रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में होर्मुज को दोबारा खोलना प्रमुख मुद्दों में शामिल है। अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात के लिए खोलना चाहता है, जबकि ईरान अपनी शर्तों के आधार पर आगे बढ़ने पर जोर दे रहा है।

14 अगस्त को ट्रंप की ओर से होर्मुज को लेकर बेहद कड़ा बयान भी सामने आया। इससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका पैदा हुई। ईरान ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए अपनी संप्रभुता और बातचीत से जुड़ी शर्तों पर जोर दिया।

खाड़ी देशों को सबसे ज्यादा किस बात का डर?

खाड़ी देशों की चिंता को तीन बड़े हिस्सों में समझा जा सकता है।

पहला, सुरक्षा का खतरा।
अगर अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव फिर तेज होता है तो ईरान की जवाबी कार्रवाई का खतरा खाड़ी देशों तक पहुंच सकता है। ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि नए अमेरिकी हमले की स्थिति में वह क्षेत्र के महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे को निशाना बना सकता है।

दूसरा, तेल और ऊर्जा संकट।
होर्मुज में लंबे समय तक संकट रहने से तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

तीसरा, अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर सवाल।
खाड़ी देशों के कुछ अधिकारियों और विश्लेषकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका की मौजूदा रणनीति वास्तव में क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बना रही है या संकट को और जटिल कर रही है।

सऊदी अरब, यूएई और कतर की स्थिति क्यों महत्वपूर्ण?

सऊदी अरब, यूएई और कतर अमेरिका के महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था मध्य-पूर्व की स्थिरता से सीधे जुड़ी हुई है।

इसीलिए वे ईरान के साथ स्थायी समाधान चाहते हैं, लेकिन ऐसा समझौता नहीं चाहते जिससे ईरान को क्षेत्रीय दबदबा बढ़ाने का अतिरिक्त अवसर मिले।

यही संतुलन इस समय सबसे मुश्किल चुनौती है। अमेरिका सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है, ईरान अपनी शर्तों पर बातचीत चाहता है और खाड़ी देश किसी भी ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं जिसमें उनका क्षेत्र दो बड़ी शक्तियों के बीच युद्ध का मैदान बन जाए।

क्या अमेरिका और ईरान में समझौता हो पाएगा?

फिलहाल इसका स्पष्ट जवाब देना मुश्किल है। 12 अगस्त तक बातचीत को दोबारा शुरू करने की कोशिशों में कोई ठोस प्रगति नहीं होने की रिपोर्ट सामने आई थी।

हालांकि कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। अमेरिका ने ईरान के साथ संपर्क के लिए पारंपरिक सहयोगियों के अलावा यूरोप के कुछ देशों तक भी अपनी पहुंच बढ़ाई है। इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन अभी भी सैन्य टकराव के बजाय किसी कूटनीतिक रास्ते की तलाश में है।

लेकिन जब तक होर्मुज, प्रतिबंध, ईरानी संपत्तियों और सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती, तब तक समझौते की राह कठिन बनी रहेगी।

आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?

ईरान-अमेरिका तनाव का असर भले ही मध्य-पूर्व में हो रहा हो, लेकिन इसका प्रभाव दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है।

अगर होर्मुज संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। इससे पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव आने की आशंका रहती है।

भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश भी अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बड़े बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संकट कितने समय तक रहता है, तेल आपूर्ति कितनी बाधित होती है और वैश्विक बाजार किस तरह प्रतिक्रिया देता है।

बड़ी तस्वीर: अमेरिका के लिए भी बढ़ रही चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ईरान अमेरिका से समझौता करेगा या नहीं। सवाल यह भी है कि अमेरिका अपने पारंपरिक खाड़ी सहयोगियों का भरोसा कितनी मजबूती से बनाए रख पाएगा।

खाड़ी देशों की मौजूदा बेचैनी बताती है कि क्षेत्रीय सहयोगी अब केवल अमेरिकी सैन्य ताकत पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीति को भी अधिक स्वतंत्र तरीके से देख रहे हैं।

हाल के वर्षों में मध्य-पूर्व में कई देश अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए चीन, रूस और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी अपने विकल्प बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ईरान संकट का लंबा खिंचना अमेरिकी प्रभाव के लिए भी रणनीतिक चुनौती बन सकता है।

निष्कर्ष

ईरान से समझौते को लेकर ट्रंप प्रशासन की कोशिशें इस समय निर्णायक मोड़ पर हैं। बातचीत में ठोस प्रगति नहीं होने और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी गतिरोध ने खाड़ी देशों की चिंता बढ़ा दी है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी सहयोगी अब ट्रंप की कूटनीतिक रणनीति की क्षमता को लेकर पहले से ज्यादा सवाल उठा रहे हैं।

आने वाले दिनों में सबसे अहम नजर इस बात पर रहेगी कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत वास्तव में दोबारा पटरी पर आती है या नहीं। अगर समझौते का रास्ता निकलता है तो इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र को बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन बातचीत फिर विफल हुई और सैन्य टकराव बढ़ा, तो इसका असर तेल बाजार, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।

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