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'तीन साल नहीं, अब एक साल की वकालत से भी बन सकेंगे जज', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती के लिए पहले अनिवार्य किए गए तीन साल के वकालत अनुभव के नियम में बड़ा बदलाव किया है। कोर्ट ने भविष्य की भर्तियों के लिए इसे घटाकर एक साल की सक्रिय वकालत कर दिया है। हालांकि, चयन के बाद उम्मीदवारों को एक साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग और एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप करनी होगी। वहीं 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवारों को पहले से तीन साल की प्रैक्टिस पूरी करने की जरूरत नहीं होगी।

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'तीन साल नहीं, अब एक साल की वकालत से भी बन सकेंगे जज', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Supreme Court Judicial Service Rule: तीन साल की जगह अब एक साल की वकालत, जानिए जज बनने का नया नियम

नई दिल्ली: देशभर के ज्यूडिशियल सर्विस अभ्यर्थियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य तीन साल की वकालत के नियम को बदलते हुए भविष्य की भर्तियों के लिए इसे एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस कर दिया है।

हालांकि, कोर्ट ने साफ किया है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए व्यावहारिक अनुभव जरूरी है। इसी वजह से चयन के बाद उम्मीदवारों को एक साल की गहन ट्रेनिंग और एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप से गुजरना होगा।

यह फैसला उन लाखों कानून स्नातकों और न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त को लेकर असमंजस में थे।

पहले क्या था नियम?

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने All India Judges Association v. Union of India मामले में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती के लिए कम से कम तीन साल की कानूनी प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी थी। इससे कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले नए स्नातक सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल नहीं हो सकते थे।

उस समय कोर्ट का तर्क था कि एक सिविल जज को अपने कार्यकाल के पहले ही दिन जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर फैसला करना पड़ता है। इसलिए उसे अदालत की कार्यप्रणाली, कोर्टरूम प्रक्रिया और बार-बेंच की भूमिका का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।

इस फैसले के खिलाफ कई रिव्यू याचिकाएं दायर की गईं।

अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदला?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पुराने फैसले की मूल सोच को बरकरार रखा, लेकिन तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त को लागू करने का तरीका बदल दिया।

पीठ में CJI सूर्यकांत के साथ जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे। बहुमत का फैसला CJI सूर्यकांत और जस्टिस मसीह ने दिया, जबकि जस्टिस विनोद चंद्रन ने असहमति जताई।

1 अप्रैल 2027 के बाद जारी होने वाली नई भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवार को कम से कम एक साल की सक्रिय वकालत का अनुभव होना चाहिए।

यानी भविष्य में तीन साल की जगह एक साल की प्रैक्टिस पर्याप्त होगी।


31 मार्च 2027 तक क्या है खास छूट?

सुप्रीम कोर्ट ने उन अभ्यर्थियों के लिए विशेष ट्रांजिशन व्यवस्था भी बनाई है, जिनकी भर्ती अधिसूचनाएं 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होंगी।

इस अवधि में उम्मीदवारों को आवेदन करने के लिए तीन साल की प्रैक्टिस पूरी करने की जरूरत नहीं होगी। कोर्ट ने ऐसे उम्मीदवारों को आवेदन के उद्देश्य से एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी मानने की व्यवस्था की है और उस अवधि के लिए अलग से प्रैक्टिस सर्टिफिकेट भी नहीं मांगा जाएगा।

यह उन कानून स्नातकों के लिए बड़ी राहत है, जिनकी करियर योजना मई 2025 के फैसले से प्रभावित हुई थी।


चयन के बाद भी सीधे जज नहीं बनेंगे

यह समझना जरूरी है कि एक साल की प्रैक्टिस के बाद परीक्षा पास करने का मतलब तुरंत नियमित जज बन जाना नहीं है।

चयनित उम्मीदवारों को पहले Trainee Judicial Officer के तौर पर काम करना होगा।

पहला चरण: एक साल की Judicial Academy Training

उम्मीदवारों को संबंधित State Judicial Academy में एक साल की गहन ट्रेनिंग दी जाएगी।

इस अवधि को पुराने तीन साल के अनुभव की व्यवस्था में एक साल की प्रैक्टिस के बराबर माना जाएगा।

ट्रेनिंग के दौरान उम्मीदवारों को नियमित जज के रूप में कोर्ट चलाने के बजाय न्यायिक कार्यप्रणाली की व्यवस्थित ट्रेनिंग दी जाएगी।

दूसरा चरण: एक साल की Law Clerkship

अकादमी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उम्मीदवारों को एक साल की संरचित Law Clerkship करनी होगी।

इसे दो हिस्सों में बांटा गया है:

  • पहले 6 महीने: Principal District Judge, District Judge, Sessions Judge या Higher Judicial Service के सदस्य के अधीन।

  • अगले 6 महीने: संबंधित हाईकोर्ट के किसी मौजूदा जज के अधीन।

इस तरह उम्मीदवारों को निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक की न्यायिक प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव मिलेगा।


ट्रेनिंग के दौरान कितनी सैलरी मिलेगी?

सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के मुताबिक ट्रेनिंग के दौरान Trainee Judicial Officers को Judicial Magistrate First Class की सकल पारिश्रमिक का लगभग आधा भुगतान किया जाएगा।

क्लर्कशिप की अवधि में भी उन्हें निर्धारित ट्रेनिंग अवधि वाला पारिश्रमिक मिलेगा।

क्लर्कशिप पूरी होने के बाद संबंधित हाईकोर्ट के जज द्वारा उम्मीदवार की प्रगति और उपयुक्तता को लेकर मूल्यांकन रिपोर्ट दी जाएगी। नियमित न्यायिक पद पर नियुक्ति के लिए यह मूल्यांकन महत्वपूर्ण होगा।


सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की शर्त क्यों बदली?

कोर्ट ने तीन साल की प्रैक्टिस को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। बल्कि उसने यह माना कि व्यावहारिक अनुभव जरूरी है, लेकिन वह अनुभव केवल बार में तीन साल की प्रैक्टिस से ही हासिल हो, यह जरूरी नहीं।

अदालत ने माना कि State Judicial Academies में व्यवस्थित ट्रेनिंग और जजों की निगरानी में क्लर्कशिप के जरिए भी उम्मीदवारों को जरूरी व्यावहारिक अनुभव दिया जा सकता है।

इससे एक तरफ युवा कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा का रास्ता खुलता है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें कोर्ट की वास्तविक कार्यप्रणाली से जोड़ने की व्यवस्था भी बनी रहती है।


2025 का फैसला क्यों बना था विवाद का विषय?

मई 2025 के फैसले से पहले करीब दो दशक तक नए कानून स्नातक सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए आवेदन कर सकते थे। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी थी।

इसके बाद अभ्यर्थियों और कुछ कानून संस्थानों की ओर से यह चिंता जताई गई कि इससे युवा और प्रतिभाशाली कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता लंबा हो जाएगा।

रिव्यू याचिकाओं में ट्रेनिंग आधारित वैकल्पिक मॉडल का सुझाव भी दिया गया था। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दोबारा खुली अदालत में सुना।


अब जज बनने का रास्ता कैसे बदलेगा?

31 मार्च 2027 तक की भर्ती

कानून की डिग्री → न्यायिक सेवा परीक्षा → चयन → 1 साल Judicial Academy Training → 1 साल Law Clerkship → मूल्यांकन → नियमित नियुक्ति

इस अवधि में उम्मीदवार को आवेदन के समय तीन साल की प्रैक्टिस की जरूरत नहीं होगी।

1 अप्रैल 2027 के बाद की भर्ती

कानून की डिग्री → कम से कम 1 साल सक्रिय वकालत → न्यायिक सेवा परीक्षा → चयन → 1 साल ट्रेनिंग → 1 साल क्लर्कशिप → मूल्यांकन → नियमित नियुक्ति

यानी तीन साल की जगह एक साल की वास्तविक बार प्रैक्टिस जरूरी होगी।


यह फैसला युवाओं के लिए क्यों अहम है?

इस बदलाव का सबसे बड़ा असर उन कानून स्नातकों पर पड़ेगा, जो पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद न्यायिक सेवा को करियर बनाना चाहते हैं।

तीन साल की प्रैक्टिस के कारण उन्हें लंबे समय तक वकालत और परीक्षा की तैयारी को साथ लेकर चलना पड़ता था। अब भविष्य में एक साल की प्रैक्टिस के बाद वे न्यायिक सेवा परीक्षा में प्रवेश कर सकेंगे।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया है कि चयन के बाद दो साल की संस्थागत ट्रेनिंग और निगरानी वाली क्लर्कशिप के जरिए उम्मीदवारों को पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव मिले।


योजना पांच साल बाद फिर होगी समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह व्यवस्था अंतिम और अपरिवर्तनीय नहीं है। इसे लागू होने के बाद इसके परिणामों का आकलन किया जाएगा।

करीब तीन साल के संस्थागत अनुभव के बाद भर्ती की गुणवत्ता, ट्रेनिंग की प्रभावशीलता और Trainee Judicial Officers के प्रदर्शन जैसे पहलुओं के आधार पर व्यवस्था की समीक्षा की जा सकती है। मौजूदा योजना को पांच साल तक लागू रखने की बात भी फैसले में कही गई है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने ज्यूडिशियल सर्विस में प्रवेश का रास्ता पूरी तरह आसान नहीं किया है, बल्कि तीन साल की बार प्रैक्टिस की जगह एक साल की प्रैक्टिस और उसके बाद लंबी न्यायिक ट्रेनिंग का नया मॉडल तैयार किया है।

31 मार्च 2027 तक आने वाली अधिसूचनाओं में बड़ी राहत है—उम्मीदवारों को तीन साल की प्रैक्टिस की जरूरत नहीं होगी। लेकिन 1 अप्रैल 2027 के बाद कम से कम एक साल की सक्रिय वकालत जरूरी होगी।

इस फैसले से युवा कानून स्नातकों को न्यायिक सेवा में जल्दी प्रवेश का अवसर मिलेगा, जबकि ट्रेनिंग और क्लर्कशिप के जरिए कोर्टरूम का व्यावहारिक अनुभव भी सुनिश्चित किया जाएगा।

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