मेक्सिको, रवांडा और सूडान भेजे जा सकते हैं प्रवासी, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने डिपोर्टेशन को फिर दी हरी झंडी
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को फिलहाल उन प्रवासियों को उनके मूल देश के बजाय किसी तीसरे देश में भेजने की अनुमति दे दी है। 29 सितंबर 2026 के आदेश से निचली अदालत की रोक अस्थायी रूप से हट गई है। सुप्रीम कोर्ट दिसंबर में इस नीति की वैधता पर विस्तार से सुनवाई करेगा। इस नीति के तहत मेक्सिको समेत कई देशों में हजारों प्रवासियों को भेजा जा चुका है।
लेखक
Vinay Mishra
वॉशिंगटन: अमेरिका में प्रवासियों के डिपोर्टेशन को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को प्रशासन को फिलहाल ऐसे प्रवासियों को उनके मूल देश के बजाय तीसरे देशों में भेजने की अनुमति दे दी।
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसने प्रशासन को तीसरे देशों में प्रवासियों को भेजने से पहले उन्हें संभावित उत्पीड़न, यातना या अन्य नुकसान की आशंका बताने का पर्याप्त अवसर देने के लिए बाध्य किया था। हालांकि, यह अंतिम फैसला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर दिसंबर में विस्तृत सुनवाई करेगा।
क्या है 'थर्ड-कंट्री डिपोर्टेशन' नीति?
अमेरिकी प्रशासन की इस नीति के तहत किसी प्रवासी को उसके मूल देश में वापस भेजने के बजाय किसी दूसरे देश में डिपोर्ट किया जा सकता है। यह व्यवस्था खास तौर पर उन मामलों में इस्तेमाल की जा रही है जहां प्रवासी का अपना देश उसे वापस लेने से इनकार करता है।
रिपोर्टों के मुताबिक, 2025 में लागू हुई इस नीति के तहत 25,000 से अधिक प्रवासियों को 29 देशों में भेजा जा चुका है। इनमें बड़ी संख्या में लोगों को मेक्सिको भेजा गया है, जबकि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई अन्य देशों में भी डिपोर्टेशन हुआ है।
मेक्सिको, रवांडा और सूडान का क्या मामला है?
अमेरिका ने अलग-अलग मौकों पर प्रवासियों को उनके मूल देश के बजाय अन्य देशों में भेजने के लिए समझौते किए हैं। मेक्सिको इस नीति के तहत सबसे अधिक इस्तेमाल किए गए देशों में रहा है।
वहीं रवांडा और सूडान समेत अफ्रीकी देशों का नाम भी तीसरे देश में डिपोर्टेशन की व्यापक नीति के संदर्भ में सामने आया है। सितंबर में एक प्रस्तावित उड़ान में करीब 70 लोगों को बुरुंडी, रवांडा और सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक भेजे जाने की योजना की रिपोर्ट सामने आई थी, हालांकि उस उड़ान को अदालत में चल रही कानूनी प्रक्रिया के बीच रद्द कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन की आपातकालीन अपील पर निचली अदालत के आदेश को फिलहाल रोक दिया। इससे ट्रंप प्रशासन को तीसरे देशों में डिपोर्टेशन फिर से शुरू करने का रास्ता मिल गया है।
यह फैसला 6-3 के अनुपात में हुआ। तीन उदारवादी न्यायाधीशों ने इस आदेश से असहमति जताई। अदालत ने साथ ही मामले को दिसंबर में पूर्ण सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
दिसंबर में होगी नीति की कानूनी जांच
सुप्रीम कोर्ट का सितंबर का आदेश अंतिम फैसला नहीं है। दिसंबर में होने वाली सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि तीसरे देशों में डिपोर्टेशन की यह नीति कानूनी है या नहीं और क्या इससे प्रवासियों के due process अधिकारों या यातना के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन होता है।
अदालत यह सवाल भी देखेगी कि निचली अदालतों के पास इस नीति पर देशव्यापी रोक लगाने का अधिकार था या नहीं।
मानवाधिकार संगठनों की आपत्ति
प्रवासियों के पक्ष में काम करने वाले वकीलों और अधिकार समूहों ने इस नीति को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि कुछ प्रवासियों को ऐसे देशों में भेजा जा सकता है जहां उनका कोई संबंध नहीं है और जहां उन्हें उत्पीड़न, यातना या हिरासत का खतरा हो सकता है।
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का कहना है कि तीसरे देशों में डिपोर्टेशन इमिग्रेशन कानून लागू करने का जरूरी साधन है, खासकर तब जब प्रवासी का मूल देश उसे वापस लेने से इनकार कर देता है।
ट्रंप प्रशासन के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
प्रवासियों का बड़े पैमाने पर डिपोर्टेशन ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीति का प्रमुख हिस्सा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से प्रशासन को कानूनी चुनौती के अंतिम नतीजे तक तीसरे देशों में डिपोर्टेशन जारी रखने की अनुमति मिल गई है।
हालांकि, दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट की विस्तृत सुनवाई के बाद इस नीति का अंतिम कानूनी भविष्य तय होगा। इसलिए मंगलवार का आदेश फिलहाल प्रभावी व्यवस्था को बहाल करता है, लेकिन इसे तीसरे देश डिपोर्टेशन नीति पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं माना जा सकता।
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