बंगाल में बड़ा अभियान: मार्च से 2,980 बांग्लादेशी नागरिक वापस भेजे गए, 1,930 सिर्फ 22 दिनों में
पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ चल रहे अभियान के तहत मार्च 2026 से अब तक 2,980 लोगों को वापस भेजा गया है। इनमें से 1,930 लोगों को केवल 19 मई से 10 जून के बीच डिपोर्ट किया गया। राज्य सरकार की "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" नीति के बाद कार्रवाई तेज हुई है। इस मुद्दे पर BSF और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के बीच भी बातचीत जारी है।
लेखक
Vinay Mishra

बंगाल में बड़ा अभियान: मार्च से 2,980 बांग्लादेशी नागरिक वापस भेजे गए, 1,930 सिर्फ 22 दिनों में
पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवास और सीमा सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ी खबर सामने आई है। राज्य में मार्च 2026 से अब तक कुल 2,980 बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजे जाने का दावा किया गया है। इनमें से 1,930 लोगों को केवल 19 मई से 10 जून के बीच भारत-बांग्लादेश सीमा के जरिए वापस भेजा गया। यह कार्रवाई राज्य सरकार की नई "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" नीति के तहत तेज हुई है।
यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब सीमा सुरक्षा बल (BSF) और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के बीच अवैध प्रवासियों की पहचान और वापसी को लेकर बातचीत जारी है।
मुख्य बातें
मार्च 2026 से अब तक 2,980 बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजे जाने का दावा।
19 मई से 10 जून के बीच 1,930 लोगों को सीमा पार कराया गया।
अप्रैल में लगभग 450 और मार्च में 600 लोगों को वापस भेजा गया।
राज्य सरकार ने "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" अभियान शुरू किया।
कई जिलों में विशेष होल्डिंग सेंटर बनाए गए हैं।
BSF और BGB के बीच प्रक्रिया को लेकर लगातार चर्चा जारी।
क्या है "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" अभियान?
पश्चिम बंगाल सरकार ने मई 2026 में अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने के लिए "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" अभियान शुरू किया था। इस नीति के तहत पहले संदिग्ध अवैध प्रवासियों की पहचान की जाती है, फिर सरकारी रिकॉर्ड से उनका नाम हटाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है और अंत में उन्हें सीमा के रास्ते वापस भेजा जाता है।
सरकार का कहना है कि यह अभियान राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है।
होल्डिंग सेंटर बने कार्रवाई का केंद्र
अवैध प्रवासियों को सीधे जेल भेजने के बजाय राज्य सरकार ने सीमा से लगे जिलों में विशेष "होल्डिंग सेंटर" स्थापित किए हैं। इन केंद्रों में उन लोगों को रखा जाता है जिनकी नागरिकता और पहचान की जांच चल रही होती है।
मालदा, मुर्शिदाबाद समेत कई जिलों में ऐसे केंद्र बनाए गए हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार मालदा स्थित केंद्र में 150 से अधिक लोगों को रखा गया था, जिनमें से कई को बाद में BSF के माध्यम से बांग्लादेश भेजा गया।
सीमा पर बढ़ा तनाव, BSF और BGB आमने-सामने
अभियान के बीच भारत और बांग्लादेश की सीमा पर कुछ तनावपूर्ण घटनाएं भी सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड ने कई मौकों पर उन लोगों की पहचान और स्वीकार्यता को लेकर सवाल उठाए हैं जिन्हें भारत की ओर से बांग्लादेशी नागरिक बताया गया।
हाल ही में एक वीडियो भी चर्चा में रहा, जिसमें BSF और BGB अधिकारियों के बीच कथित तौर पर बहस होती दिखाई दी। बांग्लादेशी पक्ष का कहना था कि किसी भी व्यक्ति को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही स्वीकार किया जाना चाहिए।
सरकार का दावा: अवैध प्रवास पर सख्त रुख
राज्य सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि अवैध प्रवास राज्य और देश दोनों के लिए गंभीर चुनौती है। मुख्यमंत्री सुबेंदु अधिकारी ने हाल के सार्वजनिक कार्यक्रमों में कहा कि सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग कार्य को तेज करने के लिए BSF को भूमि उपलब्ध कराई जा रही है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध प्रवासियों की पहचान और वापसी की प्रक्रिया से सीमा क्षेत्रों में प्रशासनिक निगरानी बढ़ेगी। इससे सुरक्षा एजेंसियों को सीमा प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
हालांकि, नागरिकता सत्यापन, दस्तावेजों की जांच और मानवीय पहलुओं को लेकर बहस भी जारी है। विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसी कार्रवाई पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए ताकि किसी वैध नागरिक को परेशानी न हो।
आगे क्या?
सीमा सुरक्षा बल और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड के बीच बातचीत जारी है। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच पहचान सत्यापन और प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने पर चर्चा हो रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और बड़े फैसले सामने आ सकते हैं।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ चल रहा अभियान देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। मार्च से अब तक 2,980 लोगों को वापस भेजे जाने और केवल 22 दिनों में 1,930 लोगों की डिपोर्टेशन कार्रवाई ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में सीमा सुरक्षा, नागरिकता सत्यापन और भारत-बांग्लादेश सहयोग इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे।
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