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JP से अन्ना हजारे तक CJP: विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकारें क्यों उठाती हैं ‘विदेशी हाथ’ का मुद्दा?

भारत में बड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकारों और सत्तारूढ़ दलों ने कई बार ‘विदेशी हाथ’ और देश को अस्थिर करने की कोशिश जैसे आरोपों का सहारा लिया है। वहीं, प्रदर्शनकारी अपने आंदोलनों को वैध ठहराने के लिए महात्मा गांधी और संविधान के सिद्धांतों का हवाला देते रहे हैं। जेपी आंदोलन, 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन और मौजूदा CJP व विपक्षी विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में यह राजनीतिक बहस फिर चर्चा में है।

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JP से अन्ना हजारे तक CJP: विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकारें क्यों उठाती हैं ‘विदेशी हाथ’ का मुद्दा?

विरोध प्रदर्शनों पर ‘विदेशी हाथ’ का आरोप: भारतीय राजनीति में पुरानी बहस

भारत की राजनीति में बड़े जन आंदोलनों के दौरान ‘विदेशी हाथ’ और देश को अस्थिर करने की कोशिश जैसे मुद्दे बार-बार सामने आते रहे हैं। सत्तारूढ़ दल अक्सर ऐसे आंदोलनों को लेकर सवाल उठाते हैं, जबकि प्रदर्शनकारी अपने विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार और संविधान से जोड़कर पेश करते हैं।

जेपी आंदोलन से अन्ना हजारे तक

1975-77 के आपातकाल के दौर से पहले और उसके आसपास जयप्रकाश नारायण यानी जेपी के नेतृत्व में चला आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बना। इस आंदोलन ने देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला और आगे चलकर इंदिरा गांधी की सत्ता से विदाई का रास्ता तैयार किया।

वर्ष 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) पर दबाव बढ़ाया। इस आंदोलन में भ्रष्टाचार के मुद्दे और जनलोकपाल की मांग प्रमुख रहे।

मोदी सरकार के सामने विरोध प्रदर्शन

लेख के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में भी विरोध प्रदर्शनों को लेकर ‘विदेशी हाथ’ और देश को अस्थिर करने जैसे तर्क राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। मौजूदा संदर्भ में NEET परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ विरोध और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष की आपत्तियों का उल्लेख किया गया है। इन मुद्दों के साथ Cockroach Janta Party (CJP) के विरोध प्रदर्शन भी चर्चा में हैं।

प्रदर्शनकारी गांधी और संविधान का देते हैं हवाला

ऐसे आंदोलनों में प्रदर्शनकारी अक्सर महात्मा गांधी के अहिंसक विरोध के विचारों और संविधान में मिले लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लेख करते हैं। इसके जरिए वे अपने आंदोलन को जनता की आवाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर विरोध के अधिकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

राजनीतिक विमर्श में दो अलग-अलग नजरिए

इन उदाहरणों से पता चलता है कि भारत में बड़े विरोध आंदोलनों को लेकर सरकारों और प्रदर्शनकारियों के बीच विचारों का टकराव लंबे समय से जारी है। एक ओर सरकारें आंदोलनों के पीछे संभावित बाहरी प्रभाव या अस्थिरता के सवाल उठाती रही हैं, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारी भ्रष्टाचार, शासन और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही की मांग करते हैं।

नोट: उपलब्ध लेखांश सीमित है। यह सामग्री उसी में दिए गए तथ्यों और संदर्भों के आधार पर तैयार की गई है।

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